ऊर्जा भक्ति


  समस्त ब्रह्मांड में विद्यमान ईश्वरीय चेतना से एकाकार होने को ही योग कहते हैं । इससे मनुष्य अपने मन को स्थिर करके आत्म - साक्षात्कार के माध्यम से मोक्ष प्राप्त कर सकता है । सनातन धर्म ग्रंथों में विभिन्न प्रकार के योग बताए गए हैं । जैसे ज्ञान योग , कर्म योग तथा भक्ति योग । ये सभी मार्ग ईश्वर चेतना तक पहुंचने के साधन हैं

ज्ञान योग में उपासक अपनी ज्ञानेंद्रियों को अंतर्मुखी मांग बनाकर निर्गुण ब्रह्म से जुड़ने का सीधा प्रयास करता है ! यह काफी कठिन मार्ग है । ऐसे में स्वाभाविक है कि इसमें भटकाव की आशंकाएं भी अधिक होती हैं ! जीवन के संघर्षों में अक्सर मनुष्य को कभी दुख तथा कभी हर्ष की अनुभूति होती है । ऐसी स्थिति में वह ऐसे सहारे की तलाश करता है जिसके साथ वह इन्हें साझा कर उचित सलाह प्राप्त कर सके । भक्ति मार्ग पर चलने वाला मनुष्य अपनी सारी व्यथा अपने आराध्य देव को सुनाकर स्वयं अपने हृदय में हितकारी सलाह का अनुभव करता है
इस प्रकार वह अपने आराध्य देव रूपी संरक्षक की देखरेख में अपनी जीवन यात्रा पूरी करता है ! इसमें सफलता प्राप्ति की प्रचुर संभावनाएं होती हैं ! सर्वविदित है सभी योग मार्गों का एकमेव लक्ष्य परम ब्रह्म की प्राप्ति ही है । इसी कड़ी में भक्ति मार्ग पर चलने वाला भक्त भी काम , क्रोध , लोभ और मद आदि विकारों की सेना पर विजयश्री का वरण कर आखिर में समस्त ब्रह्मांड के कण - कण में व्याप्त निरंकार ब्रह्म से ही जुड़ जाता है । इसमें एक महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि सीधे ज्ञान मार्ग पर चलने वाले मनुष्य को उस प्रकार का सहारा नहीं मिलता जैसा एक भक्त को अपने आराध्य देव के रूप में प्राप्त होता है ! सांसारिक जीवन में तमाम ऐसे अवसर आते हैं जब हमारी इंद्रियां हमें भटकाव की ओर उन्मुख करती हैं । ऐसी स्थिति में हमारे आराध्य में आस्था और विश्वास एवं उनसे जुड़े मूल्य ही हमें सही पथ पर आबद्ध रखते हैं । ऐसी स्थितियों में भक्ति मार्ग ही हमारी हिचकोले खाती नैया का बेड़ा पार लगाता है । इस समूचे विवरण से स्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य के लिए यह श्रेयस्कर होगा कि वह अपनी दिनचर्या में ईश्वर भक्ति को शामिल करे । इस प्रकार ईश्वरीय चेतना सदैव उसके साथ रहती है । यही चेतना उसे इंद्रिय भोग के दुष्प्रभावों से बचाते हुए जीवन में सफलता दिलाती है ।
 कर्नल शिवदान सिंह

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