जीवन में सफलता और असफलता का क्रम चलता रहता है। असफलता कुछ देर के लिए निराश व हतोत्साहित जरूर कर देती है , लेकिन यह हमें एक नया अवसर भी प्रदान करती है। अतः असफलता को सफलता की पहली सीढ़ी माना जाता है । सफलता का असली आनंद भी असफलता के बाद ही आता है। वही व्यक्ति अपेक्षित एवं मनवांछित सफलता अर्जित कर पाता है जो अपनी गलतियों से सबक लेना जानता है ।
अक्सर कुछ लोग असफल होने के बाद अपने बचाव के लिए नाना प्रकार के बहाने गढ़ने लग जाते हैं। मसलन , मैं तो गरीब था । मेरे पास तो सुविधाओं की कमी थी। धन के अभाव में अच्छी कोचिंग नहीं ले सका आदि - इत्यादि । ऐसे ढेरों बहानों की आड़ में कुछ लोग अपनी असफलता को छिपाने व औरों की नजरों में सहानुभूति का पात्र बनने में लग जाते हैं, लेकिन वे इस बात से अनजान रहते हैं कि असफलता भी एक पड़ाव है और उसका सफलता से बहुत गहरा सरोकार है। बहानों के आवरण में अपनी असफलता को छिपाने वाले व्यक्ति न तो स्वयं कभी सफल हो पाते हैं और न ही किसी के लिए प्रेरणास्त्रोत बनते हैं। अपनी असफलता के बाद आंखों से पानी बहाने वाले सफलता के लिए पसीना बहाने की बात से कभी सहमत नहीं होते हैं। उनका जीवन अंधकार की गुहा सरीखा होकर रह जाता है।
असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है भटकाव। कितने ही छात्र दिल्ली और कोटा जैसे महानगरों में आइएएस और आइआइटी की परीक्षा की तैयारी करते हैं , लेकिन उनमें से अधिकांश इसीलिए सफल नहीं हो पाते , क्योंकि वे दिशाहीन होकर भटक जाते हैं। यह भटकाव उनको दिनोंदिन झूठे सपनों के साकार होने की आस में अपनी मंजिल से दूर करता जाता है । ऐसे लोग अपनी असफलता के लिए प्रायः यह कहते पाए जाते हैं कि आजकल नौकरियां कहां मिल पाती हैं ?
अब तो पुरुषार्थ के बजाय लोगों की पहुंच ज्यादा काम आती है। इन गलतफहमियों में जीने वाले न तो असफलता के बाद स्वयं का आकलन करते हैं और न ही अपने भटकाव को समझ पाते हैं। सोचिए, अगर यही धारणा अब्राहम लिंकन और कई अहम वस्तुओं के आविष्कारक एडिसन ने बना ली होती तो क्या वे आज हमारे लिए मिसाल बन पाते।
अक्सर कुछ लोग असफल होने के बाद अपने बचाव के लिए नाना प्रकार के बहाने गढ़ने लग जाते हैं। मसलन , मैं तो गरीब था । मेरे पास तो सुविधाओं की कमी थी। धन के अभाव में अच्छी कोचिंग नहीं ले सका आदि - इत्यादि । ऐसे ढेरों बहानों की आड़ में कुछ लोग अपनी असफलता को छिपाने व औरों की नजरों में सहानुभूति का पात्र बनने में लग जाते हैं, लेकिन वे इस बात से अनजान रहते हैं कि असफलता भी एक पड़ाव है और उसका सफलता से बहुत गहरा सरोकार है। बहानों के आवरण में अपनी असफलता को छिपाने वाले व्यक्ति न तो स्वयं कभी सफल हो पाते हैं और न ही किसी के लिए प्रेरणास्त्रोत बनते हैं। अपनी असफलता के बाद आंखों से पानी बहाने वाले सफलता के लिए पसीना बहाने की बात से कभी सहमत नहीं होते हैं। उनका जीवन अंधकार की गुहा सरीखा होकर रह जाता है।
असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है भटकाव। कितने ही छात्र दिल्ली और कोटा जैसे महानगरों में आइएएस और आइआइटी की परीक्षा की तैयारी करते हैं , लेकिन उनमें से अधिकांश इसीलिए सफल नहीं हो पाते , क्योंकि वे दिशाहीन होकर भटक जाते हैं। यह भटकाव उनको दिनोंदिन झूठे सपनों के साकार होने की आस में अपनी मंजिल से दूर करता जाता है । ऐसे लोग अपनी असफलता के लिए प्रायः यह कहते पाए जाते हैं कि आजकल नौकरियां कहां मिल पाती हैं ?
अब तो पुरुषार्थ के बजाय लोगों की पहुंच ज्यादा काम आती है। इन गलतफहमियों में जीने वाले न तो असफलता के बाद स्वयं का आकलन करते हैं और न ही अपने भटकाव को समझ पाते हैं। सोचिए, अगर यही धारणा अब्राहम लिंकन और कई अहम वस्तुओं के आविष्कारक एडिसन ने बना ली होती तो क्या वे आज हमारे लिए मिसाल बन पाते।
देवेंद्रराज सुथार
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